जॉली एलएलबी 2 की फिल्‍म समीक्षा

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बॉलीवुड में ऐसी कई सारी फ़िल्में बनाई गईं, जो न्यायिक प्रणाली और उसके कामकाज पर अधारित थी । उनमें से कुछ ही फ़िल्में न्यायिक प्रणाली की खराबी को उजागर करने में सक्षम हो पाईं । उन्हीं में से एक फ़िल्म थी, साल 2013 में रिलीज हुई, जॉली एलएलबी, जिसमें अरशद वारसी, बोमन ईरानी मुख्य भूमिका में नजर आए थे । इस हफ़्ते बॉक्सऑफ़िस पर रिलीज हुई जॉली एलएलबी का सीक्वल, जिसका नाम है द स्टेट बनाम जॉली एलएलबी 2 या जिस लोकप्रिय नाम से इसे जाना जाता है, जॉली एलएलबी 2 । क्या जॉली एलएलबी 2 इसके मेकर्स को बॉक्सऑफ़िस पर ‘जॉली’ यानी खुश कर पाएगी या दंडित करेगी, आइए समीक्षा करते हैं ।

जॉली एलएलबी 2 एक व्यंग्यात्मक कोर्टरुम ड्रामा है, जो कि पूरी की पूरी कानूनी प्रणाली और आम आदमी पर न्यायिक प्रणाली के पड़े प्रभाव पर कटाक्ष करता है । फ़िल्म की शुरूआत होती है, ‘दोपहिया’ वाले जदीश्वर मिश्रा उर्फ़ ‘जॉली’ जो स्कूली बच्चों की अंग्रेजी की परीक्षा के लिए बड़े पैमाने पर नकल करने में सहायक होता है । जॉली को अपनी अंग्रेजी पर बहुत ज्यादा आत्मविश्वास होता है और वह दावा करता है कि अब तो ओबामा की मां भी किसी को असफ़ल नहीं कर सकती । इन सब के बीच, जॉली, जो अत्यंत प्रसिद्ध वकील रिजवी साब के लिए एक सहायक के रूप में काम करता है, सपने देखता है कि वह अपने बॉस के ‘चंगुल’ से बाहर आए और आजादी से सब कुछ करे । अपने सपने को पूरा करने के लिए जॉली, एक असहाय और गर्भवती महिला हिना सिद्दीकी (सयानी गुप्ता), जिसका पति एक झूठे एनकाउंटर में मारा गया था, को धोखा देता है । जब सयानी को ये महसूस होता है कि उसे जॉली द्दारा धोखा दिया गया है तो वह आत्महत्या कर लेती है । हिना के मौत की खबर जॉली को बुरी

तरह से हिला कर रख देती है और उसे उसके बुरे सपने आना शुरू हो जाते हैं । पश्चाताप के रूप में, जॉली उस केस को सही मायने में अपने हाथ में लेता है जिसकी वजह से हिना ने अपनी जिंदगी खोई । जैसे ही जॉली इस केस को लेने का फैसला करता है वैसे ही उसे बहुत शक्तिशाली और अनुभवी ‘स्ट्रीट स्मार्ट’ प्रमोद माथुर (अन्नू कपूर), जो उनके मुवक्किल, आरोपी इंस्पेक्टर सूर्यवीर सिंह (कुमुद मिश्रा) की ओर से मामले का प्रतिनिधित्व करता है, के मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ता है । और इस केस की सुनवाई में फ़ैसला लेने का अधिकार मिलता है बॉलीवुड-लविंग सुंदरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) को, जो अपने कमजोर दिल की हालत के बावजूद, जो एक न्यायाधीश के रूप में और एक शादी होने वाली बेटी के पिता के कर्तव्यों के बीच खुद को फ़ंसा हुआ पाता है । जब पूरी दुनिया जॉली के खिलाफ़ खडी होती है तब एक व्यक्ति उसके साथ खड़ा होता है और वो है उसकी पत्नी पुष्प पांडे (हुमा कुरैशी) । क्या जॉली, अपनी पत्नी के मजबूत समर्थन की मदद से विशालकाय व्यवस्था, जो कि सत्ता और राजनीति पर निर्भर है, के खिलाफ़ ये केस जीत पाएगा, क्या जॉली अकेले दिवंगत हिना सिद्दकी को और उनके परिवार को न्याय दिलाने में सक्षम हो पाएगा या जॉली बड़े-बड़े शक्तिशाली शख्सियतों के हाथ का शिकार बन जाएगा, यह सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चल पाता है ।

जब जॉली एलएलबी 2 के प्रोमो रिलीज किए गए थे, तो उन्हें देखकर पता चल गया था कि हमें फ़िल्म में क्या देखने को मिलेगा । यह फ़िल्म आज के कानून और व्यवस्था के कठोर सत्य को उजागर करने में जरा भी निराश नहीं करती है । इस फिल्म की पटकथा (सुभाष कपूर) बहुत वाक्पटु है । डेविड बनाम गोलियाथ के संघर्ष के रूप में फ़िल्म की कहानी को सफ़लतापूर्वक स्थापित करने के लिए सुभाष कपूर को पूरे में से पूरे अंक दिए जाते हैं, जो सही मायने में भारत में त्रुटिपूर्ण न्यायिक प्रणाली को दर्शाती है । सुभाष कपूर सूक्ष्म रूप से बिना किसी भी प्रकार का सहारा लिए बिना अपराध, आतंकवाद, धर्म, समाज, वास्तविक अदालती नाटक, वर्तमान न्यायिक प्रणाली, मानवीय भावनाएं और इसका बिगड़ा रूप जैसे पहलूओं को दिखाने में कामयाब रहते है । फ़िल्ममेकर के रूप में, उपदेशात्मक हुए बिना वह सब कुछ बखूबी कर जाते हैं । इन सबके अलावा, सुभाष कपूर ये दिखाने में कामयाब रहते हैं कि कैसे एक आम आदमी को न्याय पाने के लिए किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जबकि अमीर और शक्तिशाली आदमी किसी भी प्रकार के अपराध से तुरंत अपना पीछा छुड़ा लेता है । वो बात जो फ़िल्म के पक्ष में काम करती है वो है, इसकी यथार्थवादिता जो तेज गति से व्यंग्यात्मक हास्य परोसती है । फ़िल्म में कुछ हास्यपद वन लाइनर्स (मुख्यत: ‘अक्षय-वाद’ के

रूप में), और फिल्म के संवाद (सुभाष कपूर), जो कि दमदार और प्रभावशाली हैं । फ़िल्म हास्य से भरी हुई है लेकिन, ‘स्थितिजन्य कॉमेडी’ के रूप में ।

फ़ंस गया रे ओबामा, जॉली एलएलबी और गुड्डू रंगीला जैसी फ़िल्में निर्देशित करने के बाद, सुभष कपूर एक बार फ़िर जॉली एलएलबी 2 जैसी विचित्र और मजेदार फ़िल्म लेकर आते हैं । जॉली एलएलबी का सीक्वल होने के बावजूद, सुभाष कपूर ने इस बात का ध्यान रखा है कि जॉली एलएलबी 2 अपनी खुद की पहचान बनाए और अपनी पिछली फ़िल्म की मिरर-इमेज के रूप में सामने नहीं आए । फ़िल्म के फ़र्स्ट हाफ़ की तुलना में, जिसमें फ़िल्म का सेट-अप तैयार होता है और सभी किरदारों को स्थापित किया जाता है, फ़िल्म का सेकेंड हाफ़, जो बहुत ही प्रभावशाली ढंग से सामने आता है, और ये फ़िल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है । जॉली एलएलबी 2 के मेकर्स ने तमाम पहलूओं का किसी भी प्रकार से महिमागान किए बिना कोर्टरूम ड्रामा और भारतीय न्यायिक व्यवस्था की स्थिति की यथार्थवादिता को बनाए रखा है । फ़िल्ममेकर, बजाए भौंडी नकल बनाए या नाटकीय बनाने के, खुद के किरदारों पर ही जोक मारते हैं, जो कि दर्शकों को फ़िल्म से जोड़ेगी । फिल्म के संतुलित एक्शन दृश्य (परवेज शेख) फ़िल्म की कहानी के साथ मेल खाते हैं । कुछ दृश्यों को मिस बिल्कुल मत कीजिए, और वो हैं:- अपने पहले केस के लड़ने के दौरन अक्षय कुमार का बिना तैयारी के सूझबूझ, सौरभ शुक्ला का अपनी बेटी से मनीष मल्होत्रा के लहंगे के ऊपर फ़ोन पर बात करना, सौरभ शुक्ला व अन्नू कपूर के बीच धरना सीन, सैयामी गुप्ता की आत्महत्या के बाद अक्षय कुमार के दिल बदलना इत्यादि । विशेष उल्लेख, फ़िल्म के क्लाइमेक्स सीन में अक्षय कुमार द्दारा बोली गई स्पीच, वाकई ताली बजाने योग्य है ।

अभिनय की बात करें तो, यह फ़िल्म अक्षय कुमार, अन्नू कपूर और सौरभ शुक्ला की तिकड़ी दारा किए गए शानदार अभिनय का नमूना है, जो फिल्म के मजबूत पक्ष के रूप में कार्य करता है । हालांकि फ़िल्म का फ़र्स्टहाफ़ मुख्यरूप से ‘जांचे-परखे’ अक्षय कुमार के मजबूत कंधों पर विराजमान है, जबकि फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ अन्नू कपूर व सौरभ शुक्ला, जो अक्षय कुमार के साथ फ़िल्म को मजबूती से थामे रखते हैं, फ़िल्म को आगे बढ़ाते हैं । अक्षय कुमार, जिसने अपने पूरे फ़िल्मी करियर में पहली बार वकील की भूमिका निभाई, ने बहुत ही मजबूत ढंग से, पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने किरदार को निभाया है और अपने रोल में भावनाओं की एक श्रृंखला लेकर आते हैं । देश के सबसे बड़े सुपरस्टार में से एक होने के अलावा, अक्षय ने एक बार फ़िर साबित कर दिया कि वह एक दमदार और गुणी प्रदर्शक हैं । और अक्षय कुमार के दमदार अभिनय से कंधे से कंधा मिलाया अनुभवी अभिनेता अन्नू कपूर और सौरभ

शुक्ला ने । अन्नू कपूर एक भ्रष्ट वकील की भूमिका में बेहद शानदार लगते है । फ़िल्म के सेकेंड हाफ़ में उनका रोल और भी ज्यादा मजबूत बनता है । फ़िल्म के अंत में उनका प्रदर्शन वशीभूत कर देता है । अन्नू कपूर के उम्दा प्रदर्शन की झलक उस सीन में देखी जा सकती है जहां वह फ़िल्म में अक्षय कुमार के साथ बहस के दौरान लगातार शब्दों से शब्दों को मिलाते हुए बहस करते हैं । वहीं दूसरी तरफ़, सौरभ शुक्ला, एक कुंठित जज, जो सब कुछ देख सकता है, लेकिन हमेशा रिएक्ट नहीं करता, के रूप में बहुत जंचते हैं । लेकिन जब स्थिति की मांग होती है, तब वह बहुत कड़ाई से दृढतापूर्वक फ़ैसला करते हैं । चूंकि फ़िल्म में हुमा कुरैशी मुख्य अभिनेत्री हैं, लेकिन उनके अभिनय को अक्षय कुमार, सौरभ शुक्ला और अन्नू कपूर की जोड़ी ढक देती है । उन्होंने अच्छा अभिनय किया है, भले ही असाधारण है । फ़िल्म के बाकी के कलाकार शानदार हैं और अत्यंत गंभीरता के साथ अपना काम करते हैं, जो कि फ़िल्म में दिखाई देता है ।

कई संगीत निर्देशकों (मंज मुसिक, मीट ब्रदर्स, चिरंतन भट्ट) की उपस्थिति के बावजूद, जॉली एलएलबी का संगीत औसत है । दूसरे शब्दों में कहें तो, फ़िल्म के गाने बहुत सादे और साधारण हैं । फ़िल्म के कुछ स्थितिजन्य गाने, जैसे ‘गो पागल’ और ‘बावरा मन’ से लोग खुद को जोड़ेगें । वहीं दूसरी तरफ़, फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (विशाल खुराना) अच्छा है और फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करता है ।

फिल्म का छायांकन (कमल जीत नेगी) अच्छा है । वहीं दूसरी तरफ़, फिल्म का संपादन (चंद्रशेखर प्रजापति) और भी कसा जा सकता था । यदि फ़िल्म को कुछ मिनट के लिए कम दिया गया होता तो यह निश्चित रूप एक मजबूत प्रभाव पैदा कर गई होती ।

कुल मिलाकर, जॉली एलएलबी 2 एक दमदार कोर्टरुम ड्रामे के रूप में सामने आती है जो कि भावनाओं के साथ-साथ हास्य से सजी हुई है । अक्षय कुमार के दमदार अभिनय, फ़िल्म के लिए बोले गए अच्छे बोल, और करीब-करीब न के बराबर बॉक्सऑफ़िस पर कोई टकराव, फ़िल्म के पक्ष में है । जॉली एलएलबी 2 का बॉक्सऑफ़िस पर बेहद अच्छा प्रदर्शन करना संभावित है । जरूर देखिए ।

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